Sunday, September 28, 2008

SaYinGs!!- Sant Kabir Das

गुरु गोबिन्द दोउ खडे काके लागूँ पाँय
बलिहारी गुरु आपने गोबिन्द दियो बताय

कबीरा ते नर अंध है गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रूठे नही ठौर

जो तोको काँटा बुवे ताहे बोव तू फूल
तोहे फूल को फूल है ताहे है तिरसूल

तिनका कबहु ना निन्दिये जो पांव तल्ले होए
कबहु उडि आंख पडे पीर घनेरी होए

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर

बड़ा ना होवे गुणन बिन बिरद बड़ाई पाय
कहत धतूरे सो कनक गेंहू गरियो ना जाय

ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय
औरन को सीतल करे आपहु सीतल होय

बुरा जो देखन मैं चली बुरा ना मिल्या कोय
जो मन खोजा आपना मुझ से बुरा ना कोय

साधू ऐसा चाहिऐ जैसा सूप सुभाय
सार सार को गहि रहे थोथा देय उडाय

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूंगी तोय

काल करे सो आज कर आज करे सो अब
पल में परलै होयगी बहुरि करेगा कब

धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होए
माली सींचे सौ घड़ा रुत आये फल होए

माया मरी ना मन मरा मर मर गए शरीर
आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर

कबिरा प्याला प्रेम का अंतर लिया लगाय
रोम रोम में रमी रहे और अमल क्या खाय

पोथी पढी पढी जग मुआ पंडित भया ना कोय
ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय

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